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मैं कौन हूँ…….

>> Feb 8, 2011

मैं कौन हूँ , मैं कौन हूँ , मैं कौन हूँ ।
जर्रा हूँ , समन्दर हूँ , या तुफान हूँ ,
मैं कौन हूँ , मैं नहीं जानता ,
मैं खुद से अभी तक अनजान हूँ ।
पानी हूँ , कश्ती हूँ , या साहिल हूँ ,
जीवन से बन्धा एक रिश्ता या ,
रिश्तो में बन्धी एक जान हूँ ।
आँखों में छुपा एक आँसूं हूँ या ,
दिल में बसा एक अरमान हूँ ।
मैं कौन हूँ ,मैं कौन हूँ ,मैं कौन हूँ ,
मैं कौन हूँ , मैं नहीं जानता ,
मैं खुद से अभी तक अनजान हूँ ।
कौन हूँ मैं , गैर हूँ या अपना हूँ ,
बोझ हूँ किसी पर , या दुआ हूँ या ,
खुदा का किया कोई एहसान हूँ ।
मैं कौन हूँ………
खुशी हूँ , दर्द हूँ , या कोई एहसास हूँ ,
तन्हा हूँ या मैं किसी के पास हूँ ,
साज़ हूँ , राग हूँ , या दर्द भरी आवाज़ हूँ ,
मैं कौन हूँ , मैं नहीं जानता ,
मैं खुद से अभी तक अनजान हूँ ।
गीत हूँ , गज़ल हूँ , या शायर का कोई अन्दाज़ हूँ ,
मैं कौन हूँ , मैं कौन हूँ , मैं कौन हूँ ,
अन्त हूँ , मध्य हूँ , या कोई आगाज़ हूँ
मैं कौन हूँ ,मैं कौन हूँ ,मैं कौन हूँ ,
सोचते सोचते एक उम्र गुज़र जायेगी ,
है यकीं मुझको मेरी पहचान मिल जायेगी ।

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आज, ना जाने क्यों ?

आज, ना जाने क्यों ?
थक गया हूँ जीवन की इस दौड में
कोई राह नहीं सामने दूर तक
इन उनींदी आँखों में नया जीवन चाहता हूँ
आज मैं रोना चाहता हूँ

भय था कभी विकराल
लडकपन था नादान
माँ का असीम प्यार
पिता की डाँट और दुलार
जून की दोपहरी में, छत पर वही बिछौना चाहता हूँ
आज मै रोना चाहता हूँ

नाना‍‍ नानी की कहानियाँ
दादा दादी की परेशानियाँ
भैया दीदी की लडाईयाँ
पापा मम्मी की बलाइयाँ
बस उन्हीं लम्हों में आज फिर खोना चाहता हूँ
आज मैं रोना चाहता हूँ

साथियों के संग होली का हुडदंग
बारिश में कागज की नाव दबंग
गर्मियों में छुट्टियों के दिन
स्कूल में सीखने की उमंग
अपने अकेलेपन में, वो टूटे मोती पिरोना चाहता हूँ
आज मैं रोना चाहता हूँ

कुछ कर गुजरने की चाह
सफलता की वो कठिन राह
मुश्किलों का सामना करने की
पापा की वो सलाह
आज फिर से वही सपने संजोना चाहता हूँ
ना जाने क्यों, आज मैं रोना चाहता हूँ

शायद कुछ छोड आया पीछे
आगे बढ़ने की हौड में
पीछे रह गये सब,
मैं अकेला इस अंधी दौड में
लौटा दो कोई मेरा बचपन, पुराना खिलौना चाहता हूँ
हाँ, आज मैं रोना चाहता हूँ

नहीं जानता कि कहाँ जाना है
क्या कुछ वापस पाना है
इस जीवन में मै
टूट बिखर चुका हूँ कब से
उन्हीं सुनहरे पलों में जी भर सोना चाहता हूँ
आज मैं, ना जाने क्यों, रोना चाहता हूँ

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Do Kadam !!

मैं दो कदम चलता और एक पल को रूकता मगर,इस एक पल में जिन्दगी मुझसे 4 कदम आगे chali जाती,मैं फिर दो कदम चलता और एक पल को रूकता मगर,जिन्दगी मुझसे फिर ४ कदम आगे chali जाती,जिन्दगी को jeet ta देख मैं muskurata और जिन्दगी मेरी mushkurahat पर hairan होती,ये silsila yuhi चलता रहा ,फिर एक दिन मुझको hasta देख एक sitare ने पुछा "तुम harkar भी muskurate हो ,क्या तुम्हे दुःख नहीं होता haar का?" तब मैंने कहा ,मुझे पता है एक ऐसी sarhad aayegi jaha से जिन्दगी ४ तो क्या एक कदम भी आगे नहीं जा payegi और तब जिन्दगी मेरा intzaar karegi और मैं तब भी अपनी raftar से yuhi चलता रुकता wahan pahunchunga .........एक पल ruk कर जिन्दगी की taraf देख कर muskuraoonga,beete safar को एक नज़र देख अपने कदम फिर badhaoonga ,ठीक usi पल मैं जिन्दगी से jeet jaunga,मैं अपनी haar पर muskuraya था और अपनी jeet पर भी muskuraunga और जिन्दगी अपनी jeet पर भी न मुस्कुरा पाई थी और अपनी haar पर भी न मुस्कुरा पायेगी, बस तभी मैं जिन्दगी को जीना सिखाऊँगा

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